कॅरियर के नाम पर 'लूट' की दुकानें: सुपौल में काउंसिलिंग सेंटरों के मायाजाल में फंसकर बर्बाद हो रहा छात्रों का भविष्य

सुपौल जिला मुख्यालय से लेकर त्रिवेणीगंज, बीरपुर और सिमराही जैसे इलाकों में कुकुरमुत्ते की तरह खुले तथाकथित 'एजुकेशनल काउंसलिंग सेंटर' और 'एडमिशन कंसल्टेंसी' आज मासूम छात्रों और उनके मजबूर माता-पिता के लिए मानसिक और आर्थिक शोषण का अड्डा बन चुके हैं।

कॅरियर के नाम पर 'लूट' की दुकानें: सुपौल में काउंसिलिंग सेंटरों के मायाजाल में फंसकर बर्बाद हो रहा छात्रों का भविष्य

विशेष रिपोर्ट | सुपौल
"उन्होंने मुझसे कहा था कि बिहार के बाहर टॉप मेडिकल कॉलेज में डायरेक्ट एडमिशन करा देंगे। पापा ने कर्ज लेकर 2 लाख रुपये एडवांस दिए। आज 6 महीने हो गए, न कॉलेज मिला और न ही पैसे वापस मिल रहे हैं। अब वो फोन भी नहीं उठाते।" यह दर्द सुपौल के एक मध्यमवर्गीय परिवार के छात्र अमित (बदला हुआ नाम) का है, जो इन दिनों डिप्रेशन से जूझ रहा है।
यह कहानी सिर्फ अमित की नहीं है। सुपौल जिला मुख्यालय से लेकर त्रिवेणीगंज, बीरपुर और सिमराही जैसे इलाकों में कुकुरमुत्ते की तरह खुले तथाकथित 'एजुकेशनल काउंसलिंग सेंटर' और 'एडमिशन कंसल्टेंसी' आज मासूम छात्रों और उनके मजबूर माता-पिता के लिए मानसिक और आर्थिक शोषण का अड्डा बन चुके हैं।
मजबूरी का फायदा: ऐसे बुना जाता है ठगी का जाल
ये सेंटर मैट्रिक और इंटर पास कर चुके उन छात्रों को अपना निशाना बनाते हैं जो नीट (NEET), जेईई (JEE), या अन्य प्रोफेशनल कोर्सेज में कम रैंक आने के कारण परेशान रहते हैं।
गारंटीड सीट का लालच: बड़े शहरों के नामी कॉलेजों में 'मैनेजमेंट कोटा' या 'डायरेक्ट एडमिशन' का झांसा दिया जाता है।
कागजी फर्जीवाड़ा: कई बार छात्रों को फर्जी अलॉटमेंट लेटर थमा दिए जाते हैं। जब छात्र कॉलेज पहुंचता है, तब उसे पता चलता है कि उसके साथ धोखाधड़ी हुई है।
रजिस्ट्रेशन के नाम पर मोटी रकम: फॉर्म भरने और फाइल चार्ज के नाम पर शुरुआत में 20 से 50 हजार रुपये ऐंठ लिए जाते हैं, जो बाद में कभी वापस नहीं होते।
पसीने की कमाई पर डाका, टूटते सपने
सुपौल के ग्रामीण इलाकों से आने वाले अधिकांश अभिभावक किसान या छोटे व्यवसायी हैं। बच्चों के सुनहरे भविष्य की खातिर कोई अपनी जमीन गिरवी रखता है तो कोई भारी ब्याज पर कर्ज लेता है। जब ये पैसे डूबते हैं, तो पूरा परिवार बिखर जाता है। नाम न छापने की शर्त पर एक पीड़ित छात्र ने बताया, "जब हम पैसे वापस मांगने जाते हैं, तो सेंटर के लोग हमें ही कोर्ट-कचहरी और करियर बर्बाद करने की धमकी देते हैं। बदनामी के डर से हम पुलिस के पास भी नहीं जा पाते।"
प्रशासनिक लापरवाही और नियमों की धज्जियां
शहर की गलियों में बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाकर '100% एडमिशन' का दावा करने वाले इन सेंटरों में से अधिकांश के पास न तो कोई वैध रजिस्ट्रेशन है और न ही कोई गाइडलाइन। जिला प्रशासन की नाक के नीचे चल रहे इस काले कारोबार पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है, जिससे इन जालसाजों के हौसले बुलंद हैं।
छात्रों और अभिभावकों की अब एक ही मांग है कि ऐसे फर्जी सेंटरों की जांच हो, इन्हें सील किया जाए और छात्रों के डूबे पैसे वापस दिलाए जाएं, ताकि किसी और का भविष्य इस अंधेरे में न खोए।