तड़पता बायसी: बाढ़, कटी सड़कें और बदहाल अस्पताल... सीमांचल के इस इलाके की सुध कौन लेगा?

पूर्णिया जिले का सीमावर्ती अनुमंडल बायसी आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। हर साल आने वाली बाढ़, भयावह नदी कटाव, लचर स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा का गिरता स्तर इस क्षेत्र की नियति बन चुके हैं। यह स्थिति केवल एक क्षेत्र का पिछड़ापन नहीं, बल्कि दशकों की नीतिगत विफलता और प्रशासनिक उदासीनता का जीवंत प्रमाण है

तड़पता बायसी: बाढ़, कटी सड़कें और बदहाल अस्पताल... सीमांचल के इस इलाके की सुध कौन लेगा?

                                    संपादकीय 

पूर्णिया जिले का सीमावर्ती अनुमंडल बायसी आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। हर साल आने वाली बाढ़, भयावह नदी कटाव, लचर स्वास्थ्य सेवाएं और शिक्षा का गिरता स्तर इस क्षेत्र की नियति बन चुके हैं। यह स्थिति केवल एक क्षेत्र का पिछड़ापन नहीं, बल्कि दशकों की नीतिगत विफलता और प्रशासनिक उदासीनता का जीवंत प्रमाण है।इस गंभीर संकट के मुख्य कारणों और उनके निष्पक्ष निवारणों का विश्लेषण नीचे दिया गया है:
पिछड़ेपन के मुख्य कारण
बायसी के पिछड़ेपन के पहला और मुख्य कारणों में बायसी का भौगोलिक अभिशाप महानंदा, कनकई और परमान जैसी अनियंत्रित नदियों से घिरा है। हर साल बाढ़ और कटाव के कारण उपजाऊ भूमि, घर और स्कूल मलबे में तब्दील हो जाते हैं । दुसरा मुख्य कारणों में यह माना जाता है कि जनप्रतिनिधियों में इच्छा शक्ति का अभाव। चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। इसके बावजूद, विधानसभा और प्रशासनिक स्तर पर इस क्षेत्र के लिए कोई ठोस और दीर्घकालिक नीति नहीं बनाई गई। जल-नल योजना और ग्रामीण सड़क निर्माण की घोषणाएं तो हुईं, लेकिन धरातल पर भ्रष्टाचार और लचर निगरानी के कारण वे अधूरी या ठप पड़ी हैं। तीसरा मुख्य कारण यह भी है कि राजधानी पटना और जिला मुख्यालय से दूरी के कारण इस सीमावर्ती इलाके पर प्रशासनिक अधिकारियों की सीधी और पैनी नजर नहीं रहती।
संकट से उबरने के उपाय
नदी प्रबंधन और स्थायी तटबंध होना चाहिए ।केवल बाढ़ राहत बांटने के बजाय नदियों के जलमार्ग को नियंत्रित करने के लिए आधुनिक एंटी-इरोशन (कटाव निरोधी) तकनीक और पक्के तटबंधों का निर्माण युद्ध स्तर पर होना चाहिए।
सड़क और पुलों का नेटवर्क ब्लॉक ज़ीरो पॉइंट बनगामा पंचायत के मड़वा और पोखरिया जैसे कटे हुए गांवों को पक्की सड़कों और बारहमासी पुलों से जोड़ना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि आर्थिक गतिविधियों को गति मिले।
स्वास्थ्य और शिक्षा में आपातकालीन सुधार: अनुमंडल अस्पताल में डॉक्टरों की 100% उपस्थिति, आपातकालीन दवाओं की उपलब्धता और महिला साक्षरता (जो वर्तमान में बेहद कम है) को सुधारने के लिए विशेष कस्तूरबा विद्यालयों और आवासीय स्कूलों की संख्या बढ़ानी होगी।
जवाबदेही और प्रशासनिक सुधार बायसी को विकसित करने की मुख्य कड़ी है।स्थानीय पुलिस और अंचल कार्यालयों में पारदर्शिता लाने के लिए सख्त डिजिटल निगरानी व्यवस्था लागू की जाए, ताकि जनता का व्यवस्था पर भरोसा बहाल हो सके।
निष्कर्ष
ऐसे में हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि बायसी को तड़पता और तरसता छोड़कर बिहार के संपूर्ण विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। समय आ गया है कि सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस क्षेत्र के लिए एक 'विशेष बायसी विकास पैकेज की घोषणा करें। राहत की राजनीति से आगे बढ़कर जब तक यहां संरचनात्मक सुधार नहीं होंगे, तब तक बायसी का यह दंश समाप्त नहीं होगा।