बिहार में फिर छलकेंगे जाम! NCAER रिपोर्ट की बड़ी सिफारिश- खत्म हो शराबबंदी
इकोनॉमिक रिसर्च' (NCAER) की एक नई रिपोर्ट ने बड़ी बहस छेड़ दी है। अर्थशास्त्री रत्ना सहाय के नेतृत्व में तैयार की गई अध्ययन रिपोर्ट "Macro Perspective of Bihar's Development: Achievements, Unfinished Agenda, and the Way Forward" में सिफारिश की गई है कि राज्य सरकार को शराबबंदी कानून को वापस लेकर नियंत्रित बिक्री और आबकारी प्रणाली (Excise System) बहाल करनी चाहिए।
पटना:बिहार में बीते 10 सालों से लागू पूर्ण शराबबंदी नीति को लेकर देश के प्रतिष्ठित आर्थिक शोध संस्थान 'नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च' (NCAER) की एक नई रिपोर्ट ने बड़ी बहस छेड़ दी है। अर्थशास्त्री रत्ना सहाय के नेतृत्व में तैयार की गई अध्ययन रिपोर्ट "Macro Perspective of Bihar's Development: Achievements, Unfinished Agenda, and the Way Forward" में सिफारिश की गई है कि राज्य सरकार को शराबबंदी कानून को वापस लेकर नियंत्रित बिक्री और आबकारी प्रणाली (Excise System) बहाल करनी चाहिए।
14 से 15% राजस्व का सीधा नुकसान
शराबबंदी लागू होने से पहले आबकारी कर से बिहार के कुल राजस्व का लगभग 14% हिस्सा आता था। रिपोर्ट के अनुसार, बंदी के कारण राज्य को हर साल लगभग ₹9,000 से ₹10,000 करोड़ के राजस्व का घाटा हो रहा है, जिसे शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसे विकास कार्यों में लगाया जा सकता था।
अवैध शराब और नशीली दवाओं का बढ़ा कारोबार
वैध बिक्री बंद होने से राज्य में समानांतर कालाबाजारी और बूटलेगिंग का जाल फैल गया है। शराबबंदी के बाद लोग अवैध व जहरीली शराब के साथ-साथ अन्य खतरनाक नशीले पदार्थों (Alternative Intoxicants/Drugs) की ओर रुख कर रहे हैं।
महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने में बेअसर
एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि शराबबंदी लागू होने के बाद भी महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कोई व्यापक कमी दर्ज नहीं की गई है। जिस मुख्य उद्देश्य (महिला सुरक्षा) को ध्यान में रखकर यह नीति लागू की गई थी, वह हासिल नहीं हो सका।
निगरानी और कानून-व्यवस्था पर बढ़ा बोझ
शराबबंदी को लागू कराने, छापेमारी करने और मुकदमों से निपटने में पुलिस और प्रशासन का बड़ा संसाधन और धन खर्च हो रहा है, जिससे अन्य आपराधिक मामलों की जांच प्रभावित हो रही है।
आगे का रास्ता (NCAER का सुझाव)
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि शराब की पूर्ण बंदी के बजाय सरकार को इसकी नियंत्रित बिक्री (Regulated Sales) शुरू करनी चाहिए। आबकारी शुल्क की वापसी से न केवल पुलिस-प्रशासन का बोझ कम होगा, बल्कि प्राप्त राजस्व का उपयोग रोजगार सृजन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में किया जा सकेगा।